76वें बर्लिन अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में सिद्धार्थ काथिर की सिनेमाई प्रतिभा की चमक
एसआरएफटीआई से बर्लिन तक
76वें बर्लिन अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में सिद्धार्थ काथिर की सिनेमाई प्रतिभा की चमक
शीर्ष स्तर पर मिली यह उपलब्धि सत्यजीत राय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एसआरएफटीआई) के लिए शांत किंतु गहन गर्व का क्षण है, जहाँ के पूर्व छात्र सिद्धार्थ काथिर आज अंतरराष्ट्रीय मंच पर आलोकित हो रहे हैं। संस्थान को अपने पूर्व छात्र की इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर गर्व है। तमिल फीचर फिल्म सिक्कलाना कुदुम्बथिन उरुप्पिनरगल (समस्याग्रस्त परिवार के सदस्य)
, जिसका निर्देशन रामलिंगम गौतम ने किया है, को आधिकारिक रूप से बर्लिन अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के 76वें संस्करण के लिए चयनित किया गया है—जो विश्व के सबसे प्रतिष्ठित फिल्म महोत्सवों में से एक है।
डायरेक्टर ऑफ फोटोग्राफी (डीओपी) के रूप में सिद्धार्थ काथिर ने अपनी दृश्य संवेदनशीलता और कलात्मक सटीकता से फिल्म को नई ऊँचाई दी। उनकी प्रभावशाली सिनेमैटोग्राफी ने कहानी कहने की प्रक्रिया को गहराई और सौंदर्य प्रदान किया। बर्लिन फिल्म महोत्सव में यह चयन न केवल इस परियोजना के लिए ऐतिहासिक क्षण है, बल्कि यह भारत के अग्रणी फिल्म संस्थानों में एसआरएफटीआई की प्रतिष्ठा को भी सुदृढ़ करता है।
विश्वभर से मिल रही सराहना इस बात का प्रमाण है कि एसआरएफटीआई के स्नातक वैश्विक सिनेमा में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। कोलकाता से आरंभ होकर बर्लिन तक पहुँचने वाली सिद्धार्थ की यह यात्रा शिल्प, दृश्य-रचना और सामूहिक सृजन की गहरी साधना का परिणाम है। ऐसे क्षण एसआरएफटीआई को उन प्रमुख मीडिया संस्थानों की सूची में और दृढ़ता से स्थापित करते हैं, जहाँ से स्नातकों की सफलताएँ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गूँजती हैं।
हर वर्ष बर्लिन फिल्म महोत्सव नए और साहसी स्वरों के साथ-साथ अनुभवी निर्देशकों को भी मंच प्रदान करता है। ऐसे प्रतिष्ठित मंच पर एसआरएफटीआई का एक पूर्व छात्र खड़ा हो—यह अनुभव निःशब्द, परंतु अत्यंत भावपूर्ण है।
सिद्धार्थ की यह उपलब्धि आने वाले अनेक विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। यह क्षण केवल उनका नहीं, बल्कि एसआरएफटीआई के प्रत्येक उस स्वप्नदर्शी का है जो सत्य के फ्रेम रचने की आकांक्षा रखता है। एक कहानी उभरती है, पर उसकी प्रतिध्वनि उन अनेक आवाज़ों में सुनाई देती है जो अभी अपनी अभिव्यक्ति की तलाश में हैं। शांत समर्पण और साहसी दृष्टि के माध्यम से प्रभाव स्वयं मार्ग बना लेता है। जब अंतिम क्रेडिट्स भी समाप्त हो जाते हैं, तब जो शेष रहता है, वह है कहानियों की वह शक्ति जो दृष्टिकोण बदल देती है। आपने वह मुकाम हासिल कर लिया है—स्पष्ट रूप से दिखाई देता हुआ, और गहराई से अनुभव किया जाने वाला।












